गुजरात के वो भयानक दंगे जो मोदी और 2002 से पहले हुए

    कहा जाता है कि जो दीया प्रकाश फैलाता है उसके नीचे हमेशा अंधेरा ही रहता है। गुजरात प्रांत के साम्प्रदायिक तनाव को बयान करने के लिए शायद यह कहावत सबसे सटीक है। गुजरात वही राज्य है जहां दुनिया के सबसे बड़े अहिंसा के संत मोहन दास करमचंद गांघी जी का जन्म हुआ। गांधी जी की अहिंसा की कर्मभूमि का सबसे बड़ा स्थान बनकर उभरा साबरमती में स्थिति उनका गांधी आश्रम, जहां आज भी देश विदेश से लोग गांधी को और निकटता से समझने के लिए आते हैं। इसे अपवाद ही कह सकते हैं कि अहमदाबाद में साबरमती के जिस किनारे पर ये आश्रम है उस नदी के दूसरे किनारे बसे अहमदाबाद शहर का साम्प्रदायिक इतिहास बहुत क्रूर और भयावह है।

    साल 1946 में अहमदाबाद म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन में  मुस्लिम लीग का अच्छा खासा दबदबा था। ऐसा कहा जाता है कि इसी साल हिंदू आस्था के मुताबिक निकली एक रथयात्रा के दौरान, हिंदू अखाड़ा और सड़क पर खड़े मुस्लिम दर्शकों के बीच हुई तथाकथित बहस ने उग्र रूप धारण कर लिया नतीजन कुछ ही पलों में दोनों तरफ से भारी पथराव, आगजनी, छुराबाज़ी जैसी घटनाओं ने कई जाने ली, कानून व्यवस्था को बनाये रखने के लिये, कर्फ्यू लगा दिया गया। सामान्य स्थिति बहाल होने तक कई दिन शहर में कर्फ्यू लगा रहा।

    इसके पश्चात, साल 1969 में जब काँग्रेस की बहुमत की सरकार थी और हितेंद्र देसाई मुख्यमंत्री थे, इस साल अहमदाबाद के इतिहास के भयावह दंगो में से एक दंगा हुआ था। दंगों की शुरूआत क्यों हुई इसके लिए दो अलग-अलग घटनाओं का ज़िक्र मिलता है लेकिन दोनों घटनाओं  का केंद्र एक ही है जग्गनाथ मंदिर के पास का इलाका। एक बात ये कही जाती है कि उर्स के दिन मंदिर में वापस आ रही गायों पर टिप्पणी हुई और कहा गया कि मंदिर लौट रही गायों कि वजह से उर्स में खलल पड़ी। वहीं दूसरी जगह कहा जाता है कि 20 सिंतबर 1969 को यहां पास ही के एक मुस्लिम युवक को पहले पीटा गया और बाद में हिंदू भगवान का नाम उच्चारण करने को मजबूर किया गया। अंत में इस युवक को आग लगाकर मार दिया गया। इस घटना के बाद पूरा शहर जल उठा। इसी आग की चपेट में बगल का शहर वडोदरा भी आ गया था, जहां कहा जाता है कि मुस्लिम दुकानों और जायदाद को चिन्हित करके उन्हें आग के हवाले कर दिया गया।

    कुल मिलाकर साल 1969 में ही 550 से ज्यादा सम्प्रदायिक घटनाओं को पूरे गुजरात राज्य में दर्ज किया गया था, जहां एक अनुमान के मुताबिक 1000 से ज़्यादा मौत हुई थी और करोड़ो की संपति का नुकसान किया गया था। 

    साल 1981 में काँग्रेस की सरकार गुजरात में थी जब आरक्षण का एक नया फॉर्मूला लाने की बात कही गई। इस फार्मूले को KHAM का नाम दिया गया, K से क्षत्रिय (उच्च वर्ग के क्षत्रिय नहीं), H से हरिजन,  A से आदिवासी ओर M से मुस्लिम। ये इस KHAM योजना का ही करिश्मा था की साल 1985 में कांग्रेस एक बार फिर चुनाव जीत का सत्ता में थी। जनता को जिस KHAM आरक्षण योजना से बहुत बड़ी आस थी, उसे लागू करने में उच्च जाती का वर्ग खासकर गुजरात की राजनीति में किंग मेकर कहे जाने वाला पटेल या पाटीदार समाज इसका कड़ाई से विरोध कर रहा था। नतीजन उच्च जाती और निम्न वर्ग में सड़क पर ही हिंसक झड़प होनी शुरू हो गयी, जिसकी आग में कुछ समय बाद मुस्लिम समाज को भी शामिल कर लिया गया धीरे-धीरे जातिगत लड़ाई कब साम्प्रदायिक लड़ाई में बदल चुकी थी ये पता लगाना मुश्किल था।

    दंगाई, पुलिस के साथ झड़प से बचने के लिए औरतों को आगे कर रहे थे, यहां पुलिस पर भी इल्ज़ाम लग रहा था कि ये एक वर्ग का साथ दे रही है। आमतौर पर पथराव तक सीमित रहने वाला तनाव अब कहीं आगे बढ़ गया था, बंदूक, पेट्रोल बम्ब इत्यादि आधुनिक हथियारों का इस्तेमाल दोनों समुदाय की ओर से हो रहा था, फरवरी 1985 से शुरू हुआ ये साम्प्रदायिक दंगा अक्टूबर 1986 तक चला था। यही वक़्त था जब विश्व हिंदू परिषद और बजंरग दल के कार्यकर्ताओं की सूची बड़ी होती जा रही थी।

    साल 1987, 1989, 1990 ओर 1992, में राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद का मुद्दा छाया रहा जिसके कारण शहर के दूसरे हिस्सों में भी तूफान बढ़ता रहा। जब राम जन्मभूमी आंदोलन को बल देने के लिये लाल कृष्ण आडवाणी का रथ गुजरात के सोमनाथ से चला था, जिसके बारे में ये भी कहा जाता है कि इस रथयात्रा की सभी तैयारी उस समय के भाजपा के गुजरात इकाई के महासचिव नरेन्द्र मोदी ने की थी। उस समय शहर में साम्प्रदायिक तनाव अपने चरम पर था। जहां एक तरफ नारे लग रहे थे बच्चा-बच्चा राम का, वहीं दूसरी तरफ मुस्लिम समाज के जज़्बात बाबरी मस्जिद से जुड़े हुये थे। और जिस दिन 06 दिसंबर 1992 के दिन बाबरी मस्जिद को राम सेवकों द्वारा ध्वस्त किया गया उस दिन अमूमन शांत रहने वाले शहर सूरत में भी दंगे भड़क गए थे।

    इन दिनों तनाव इतना बढ़ गया था कि स्कूल, कॉलेज, बच्चे, सड़क सब जगह हिंदू मुस्लिम मुद्दा छाया हुआ था। कहीं राम जन्मभूमि के संदर्भ में भड़काऊ बयानबाज़ी हो रही थी तो कहीं ऐसे भाषणों से सटी हुई ऑडियो कैसेट मुफ्त बाटी जा रही थी। कम्यूनल प्रचार का हर हथकंडा अपनाया जा रहा था, इस तरह का सम्प्रदायिक माहौल बना दिया गया था कि घर से सुबह निकले व्यक्ति को ये पता नहीं होता था कि आज उसकी रात कहां कटेगी, क्योंकि अगर कर्फ्यू लग गया तो हो सकता है कि रात को बाज़ार की दुकान में ही सोना पड़ जाए।

    इसके पश्चात 1997 और 99 के दौरान, खासकर दक्षिण गुजरात में ईसाई समुदाय पर हमले किये गए। जहां हथकंडा अपनाया गया कि ईसाई समुदाय गरीब और दलित समुदाय का जबरन धर्म परिवर्तन करवा रहे हैं।

    19 वीं सदी में, गुजरात खासकर इसके मुख्य व्यवसायी शहर अहमदाबाद का सम्प्रदायिक दंगो का अपना ही इतिहास रहा है। सैकड़ों की तादाद में धर्म और मज़हब के नाम घटनाे हुई है जहां हज़ारों की तादाद में लोगों की जान गई है। इसके कारण ही, आज अहमदाबाद शहर, खासकर ऊत्तर, मध्य और दक्षिण गुजरात के शहरों और कस्बो में यहां तक की गांवों में भी दोनों समुदाय के लोग अलग-अलग रहते हैं।

    अहमदाबाद शहर में कई ऐसे इलाके है जहां मुख्य सड़क के एक तरफ हिंदू बस्ती है वहीं दूसरी तरफ मुस्लिम बस्ती, अगर दोनों समुदाय में कोई रिश्ता है तो वो ज़्यादातर व्यवसाय तक ही सीमित है।

    इन दंगों की एक और भी मुख्य वजह थी 80 के दशक में गुजरात में शराब बंदी। शराबबंदी को कुछ लोगों ने पैसे कमाने के ज़रिए के तौर पर देखा और इस काम में अपना-अपना दबदबा कायम करने के लिये कई गैंग काम करने लगें। इसमें सबसे नामचीन था अब्दुल लतीफ, लेकिन दूसरी तरफ भी लोग थे। जब शहर में कानून व्यवस्था बिगड़ गई हो तब गैरकानूनी काम करने की आज़ादी मिल जाती है। कहने का यही मतलब है कि हिंदू मुस्लिम साम्प्रदायिक तनाव का हर जगह लाभ प्राप्त किया गया है फिर चाहे राजनीति का अखाड़ा हो या गैर कानूनी कामकाज।

    सबसे बड़ा सवाल यही है कि दंगे होते क्यों हैं और इन दंगों में मरता कौन है? वास्तव में जब एक नागरिक और समाज की व्यवस्था के प्रति निराशा चरम पर पहुंच जाती है जहां बेरोज़गारी और गरीबी हद से बढ़ जाती है, तब तब व्यवस्था में मौजूद लोग इस निराशा का इस्तेमाल माहौल को बिगाड़ने में ही करते हैं

    इन दंगों में कहने को तो हिंदू, मुसलमान, सिख या ईसाई मरते हैं लेकिन वास्तव में समाज का कमज़ोर और गरीब नागरिक ही मारा जाता है, जिसकी सुरक्षा का ज़िम्मा सरकार पर होता है।

    बस यही है गुजरात के साम्प्रदायिक तनाव की कहानी, जहां गांधी का जन्म हुआ, गांधी को सम्मान भी मिला लेकिन साम्प्रदायिक हिंसा की आग ने गांधी की अहिंसक विचार धारा को सिरे से नकार दिया।

     

    (हरबंश सिंह) 

    साभार- (YKA)

     

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