शब-ए-क़द्र में आसमान से उतर के फर्श पर आते हैं फ़रिश्ते

    शिया शहर क़ाज़ी मौलाना हामिद हुसैन

    रमज़ान -उल – मुबारक का आखरी अशरा जो बहुत ही रहमत और अज़मत का अशरा होता है जो 21 रमज़ान से 30 रमज़ान तक रहता हैं इस शब-ए -कदर में अल्लाह असमान से बेशुमार फ़रिश्तो को फर्श पर उतरता है और रहमत के दरवाज़ों को खोल देता है ! शिया शहर क़ाज़ी मौलाना हामिद हुसैन ने अपने इस बयान में फ़रमाया की इस दरम्यान अल्लाह के बन्दों को दिल खोल कर अल्लाह की इबादत करना चाहिए जिससे की फ़रिश्ते अपने रजिस्टर में आप का नाम शुमार कर ले और आप की नेकी में बेशुमार इज़ाफा हो और अल्लाह आप के गुन्हाओ की माफ़ कर दे !

    क़ुरान-ए-मजीद जिसे अल्लाह का कलाम भी कहते हैं ये बा बरकत किताब जो असमान से उतरी आखरी और मुक़म्मल किताब है जिसकी इबादत मुसलमानों को हर हाल में करना चाहिए और इसके इल्म के खुद को बुलंद कर के अल्लाह की नज़रों  में एक बेहतरीन बन्दे के रूप में पेश हों 

    मौलाना ने आगे फ़रमाया की – अल्लाह ने अपने बन्दों की यक़ीनी तौर पर शब-ए-क़द्र क्यों नहीं बताया, इसका जवाब ये है की ऐसी एक रात में लोग खूब इबादत करते हैं  फिर ये सोच कर बैठ जाते हैं कि उस रात में हमने मुक़म्मल इबादत कर ली जो हज़ार रातों से अफज़ल है अल्लाह हमारी मग्फेरत कर देगा और हमारे गुनाहों को बख्श देगा !

    मौलाना ने कहा की वो रात बेशक हज़ार रातों से अफज़ल है उस रात का सवाब बहुत ज़्यादा है और अल्लाह की रहमत के दरवाज़े उसके बन्दों की लिए खुले रहते हैं और फ़रिश्ते अर्श से फर्श पर सिर्फ अल्लाह के बन्दों के लिए आते हैं ,लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि इस मुबारक महीने के जाने के बाद आप अल्लाह की इबादत से दूर हो जाएँ और तमाम तरह के अज़ाबो में मुब्तेला हो जाएँ और ये सोच लें की हम तो उस रात पूरी इबादत कर चुके ! 

      कानपुर शिया शहर क़ाज़ी -मौलाना हामिद हुसैन साहब 

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