इस्लाम और धार्मिक सहिष्णुता

    Shuaib Alam Qasmi
    इस्लाम एक सार्वभौमिक धर्म है, इस्लाम की शिक्षाएँ सभी मानव जाति के लिए हैं, इस्लाम केवल एक विशेष वर्ग, संस्कृति और रंग व नस्ल के लोगों को संबोधित नहीं करता बल्कि सभी इंसानों को संबोधित करता है, वह धर्म दया का धर्म है। क्योकि  शब्द इस्लाम का अर्थ ही सुरक्षा(सलामती)  है तो इस्लाम जो वहदहू लाशरिक लहु, एक ईस्वर को पूजनीय  करार देता है वह रहमान और रहीम बल्कि अरहमूर राहिमीन(सब से ज़्यादा दया करने वाला) है, इस्लाम जिस जाति को पैगम्बर मानता है वह रहमतुल्ल लिल आलमीन(दुनिया के लिए रहमत) है। इस्लाम का किबला शांति का गहवारा है इस्लाम का महीना आरंभ सुरक्षा की दुआ के साथ होता है । इस्लाम की इबादत (पूजा) में भी शांति और सुरक्षा की दुआएं है। मुसलमान मरता भी है तो शांति व सलामती और इताअत व फ़रमाँबरदारी की मौत मरना चाहता है।
    इसलिए इस्लाम के अर्थ, उसके उद्देश्यों तालीमात, इसकी शुरुआत और आगाज़ और प्रकाशन सभी ही शांति और सुरक्षा हैं, तो  उस धर्म से ज्यादा शांति व सलामती किस धर्म मे हो सकती है।
    आलोचकों का प्रोपेगण्डा
    लेकिन इस्लाम के आलोचक तरह तरह के परोपेगंडे करते हैं, और संवेदनहीन आरोपों द्वारा इस्लाम को हिंसक और आतंकवादी धर्म बताते हैं जबकि मुसलमानों को जालिम व आतंकवादी घोषित करने के लिए  संघर्ष करते रहते हैं, और दुनिया की नज़रों में इस्लाम की छवि को कलंकित करने की ताबड़तोड़ कोसिश में व्यस्त रहते हैं। वे विभिन्न ऐतिहासिक घटनाओं को तोड़मरोड़ कर और उन्हें गैर वाकई तरीके से पेश करके इस्लामी शिक्षाओं से जोड़ते हैं, और यह साबित करते हैं कि इस्लाम में विस्तार और सहिष्णुता नाम की कोई चीज़ नहीं है, बल्कि इस्लाम हिंसा और खूंखार पसंद धर्म है। अपने संदर्भ से कुरान की कुछ आयतों (छंदों) को अपने इरादे के अनुसार कटौती और उनका अर्थ बयान करके अपने हम विचारों में उत्तेजना पैदा करने की कोशिश करते हैं, जबकि वास्तविकता इसके बिल्कुल उलट है।
     कुरान में धार्मिक सहिष्णुता
     अल्लाह सर्वशक्तिमान इरशाद फ़रमाते हैं: अनुवाद: “ऐ ईमान वालों! ऐसे बन जाओ  कि अल्लाह (आज्ञाओं के पालन) के लिए हर समय तैयार रहो, और किसी कौम की दुश्मनी तुम्हें इस बात पर आमादा न करे कि तुम अन्याय करो, न्याय से काम लो, यही तरीका  है अल्लाह के करीब होने का, और अल्लाह से डरो, अल्लाह तुम्हारे काम से पूरी तरह खबरदार है। इस आयत के अंदर सहिष्णुता को बतलाया है।
    मतलब यह है कि धर्म, सभ्यता, संस्कृति, भाषा या रंग नस्ल  में मतभेद रखने वाले हर व्यक्ति के साथ चाहे वह दोस्त हो या दुश्मन न्याय का मामला किया जाये, उसके धर्म आदि के कारण उसके साथ कोई भेदभाव न किया जाए, न किसी की ज़्यादती या अत्याचार उचित होगा। सूरतुल हूद आयत नं  811 में अल्लाह फरमाता  हैं:-
    ”यदि तुम्हारा रब चाहता तो सभी मनुष्यों को एक ही तरीके का  पैरोकार बना देता  (लेकिन किसी को जबरन किसी धर्म पर मजबूर  करना हिकमत का तकाजा  नहीं,है  इसलिए अपने विकल्प अलग तरीके अपनाने का मौका दिया गया) और अब वह हमेशा विभिन्न मार्गों पर ही रहेंगे।”
    इस आयत का अर्थ यह है कि, हर व्यक्ति के मद्देनजर यह बात रहनी चाहिए कि विभिन्न क्षेत्रों में जो धार्मिक और वैचारिक मतभेद है वह स्वाभाविक है, इसे समाप्त नहीं किया जा सकता है। इसलिए उदारता का प्रदर्शन करना और दूसरों के धर्म, मान्यताओं विचार आदि को सहन करने के लिए हौसला पैदा करना चाहिए और उनके साथ धार्मिक, राजनीतिक और बौद्धिक सहिष्णुता का मामला होना चाहिए।
    विरोधियों की तरफ से एक आरोप यह दिया जाता है कि इस्लाम धर्म का प्रकाशन तलवार के ज़ोर से हुआ, जबकि उसका कोई सबूत नहीं मिलता, तथ्य यह है कि इस्लाम कृपा, नैतिकता और सहिष्णुता से  फैला है। कुरान स्पष्ट नियम वर्णन करता है:(सूरः बकरा आयत नं 256) इस्लाम मे धर्म के लिए कोई जबरदस्ती नही है। हिदायत का रास्ता गुमराही से मुमताज़ होकर  वाजेह हो चुका।
    धार्मिक सहिष्णुता को लेकर एक बड़ी कोताही हमारे द्वारा भी हो रही है, धार्मिक सहिष्णुता वह उज्ज्वल और उदाहरण जो अतीत में मिलता हैं, मौजूदा दौर में बहुत कम हो गया है-और हमने इस्लाम के एक महत्वपूर्ण आदेश इस्लाम का प्रकाशन और प्रचार-प्रसार बहुत कम कर दिया है और हमने इस्लाम के एक अहम हुक्म दावत ए इस्लाम और  तब्लीगे दीन को  बिल्कुल तर्क कर दिया है। और अल्लाह रब्बुल्लआलमीन और रहमतुल्ल लील आलमीन को विशेष मुस्लिम क़ौम का प्रभु और पैगंबर समझ लिया है, जबकि अल्लाह सभी ब्रह्मांड का प्रभु और पैगंबर s.a.w. पूरी मानवता और दुनिया के नबी हैं। इस संदेश को आम किया जाये और अन्य कौमो  को इसकी दावत दी जाये अल्लाह सबके प्रभु और मुहम्मद अरबी  स.अ.व. सबके नबी और रसूल हैं, तो कुछ दूरियां कम होंगी और आपसी फासले सिमट जाएंगे  इसलिए, एक कवि ने मुसलमानों पर आपत्ति जताई:-
    मालूम है तुमको कुछ मुहम्मद (s.a.w.) का मक़ाम
    वह उम्मते इस्लाम में महदूद नही है।
     एक सिख शायर , महिंद्रा सिंह बेदी ने इस आशय में अपने ऐतराज का वर्णन किया है:-
    इश्क हो जाये किसी से कोई चारा तो नही
     सिर्फ मुस्लिम  का मोहम्मद (स.अ. व.) पर इजारह तो नही।
    (यह लेखक के अपने निजी विचार हैं

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