इंसानियत क्या है ?

    जब देश में धर्म के नाम पर कत्ल ओ गारत गरी हो, जब देश में हज़ारों लोगों के सामने किसी को पीट पीट कर मार दिया जाए, जब देश में धर्म के नाम पर घर फूंक दिए जाए और अमरनाथ की यात्रा पे बुगुनाहो को मार दिया जाये तो ऐसे में मन में एक ही सवाल आता है कि ‘इंसानियत’ किस बला का नाम हैॽ आखिर क्यों लोग धर्म के नाम पर इंसानियत भूल जाते हैं या इंसानियत के नाम पर धर्म भूल जाते हैंॽ मुझे अच्छी तरह याद है कि बचपन में हमें स्कूल में एक सबक रटाया गया था कि ‘हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई आपस में सब भाई भाई’ और आज तक के परिवेश में हमने यही जाना और समझा कि धर्म कोई भी हो उसका आदर एंव सम्मान करना चाहिए क्योंकि सभी धर्म इंसानियत का पाठ पढ़ाते हैं। लेकिन पिछले कुछ सालों से यह देखने को मिल रहा है कि इंसानियत को लेकर हमारी धारणाएं बदल रही हैं। कुछ लोग केवल अपने धर्म को ही इंसानियत का पर्याय समझते हैं और दूसरों के साथ बुरा व्यवहार करना उनको तकलीफ पहुंचाना उनकी नज़र में अपनी इंसानियत की रक्षा करना होता है। वहीं इंसानियत को लेकर हमारे समाज में एक उदारवादी तबका भी पाया जाता है जिसके अनुसार जहां धर्म होगा वहां इंसानियत नहीं होगी यानि धर्म इंसानियत को मिटा देता है। इन दो तबकों के बीच एक तीसरा तबका भी पाया जाता है जिसके अनुसार दूसरों कि खुशी ही इंसानियत होती है लेकिन तब तक जब तक उस खुशी के लिए हमें कोई बलिदान न देना पड़े। लगभग इन सबके बीच वह नारा कहीं नहीं सुनाई पड़ता कि ‘हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई आपस में भाई भाई’। यह केवल एक नारा नहीं था बल्कि हमारे समाज की संस्कृति थी, एकता थी, पहचान थी जो अब लुप्त होती जा रही है।

    Saheefah Khan

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