आज़ादी एक ऐसा शब्द है, जिसे हमारा समाज कभी पूर्ण रुप से समझ ही नहीं सका

    • आज़ादी एक ऐसा शब्द है जिसे मानव कभी पूर्ण रुप से समझ ही नहीं सका या यूं कह सकते हैं कि यह इतना व्यापक शब्द है कि जिसकी जितनी व्याख्या की जाए वह शून्य ही दिखाई पड़ती है। धर्म गुरुओं के लिए आज़ादी का मतलब होता है धर्म के मामले में किसी भी प्रकार की दख़लअंदाज़ी न हो, धर्म में आस्था न रखने वालों के लिए आज़ादी का अर्थ होता है कि सभी धार्मिक रीति रिवाजों से छुटकारा, 50 की उम्र पार कर चुके व्यक्तियों के लिए आज़ादी का तात्पर्य अपनी परंपराओं को बरकरार रखने से है तो वहीं युवाओं के लिए आज़ादी का अर्थ उन सभी रीति रिवाज़ो को दरकिनार कर आगे बढ़ने से है।

    इसी प्रकार हर किसी के लिए आज़ादी का अर्थ जुदा होता है, कुछ लोगों के लिए पश्चिम सभ्यता को अपनाना ही आज़ादी होता है तो कुछ के लिए अपनी संस्कृति को बचाये रखना आज़ादी। इसी प्रकार प्राचीन काल से महिलाओं की आज़ादी के विषय में चिंतन होता आया है। जैसे जैसे सभ्यता का विकास होता गया वैसे वैसे इस आज़ादी की आवाज़ ज़ोर पकड़ती गयी जिसने 21 वीं सदी में पहुंचने तक औरत को हर प्रकार की आज़ादी दे दी। अब औरत आज़ाद है किसी भी प्रकार का पहनावा पहनने के लिए, किसी भी जगह नौकरी करने के लिए, किसी भी इसांन के साथ ज़िंदगी बसर करने के लिए। किसी के भी साथ संबध बनाने के लिए।

    कहते हैं कि जब नैतिकता का विकास होता है तो स्त्री पुरुष के समान खड़ी हो जाती है, समाज में दोनो को एक समान दर्जा मिल जाता है और यही से आज़ादी की शुरुआत होती है, इसी आज़ादी को दुनिया ने स्वीकारा भी और इसके लिए तमाम आंदोलन भी बरपा हुए। किंतु इस आज़ादी ने विकास की इतनी मज़िंलें तय कर डाली कि नैतिकता को ही पीछे ढकेल दिया। वर्तमान समय में आज़ादी उस चरम सीमा तक पहुंच चुकी है कि नैतिकता की पराजय होने लगी है।

    भारतीय संस्कृति पर भी इसने कुठाराघात करना शुरु कर दिया। हमारी संस्कृति की यह विशेषता थी कि यहां महिला को देवी समझ पूजा जाता था और विवाह को एक पवित्र बंधन माना जाता था जिसे निभाना पति पत्नी का कर्तव्य होता था और इसे निभाने के लिए वे प्रेम, वफा का सहारा लेकर बड़े आराम से जीवन बसर करते थे जहां सुकुन होता था, समृद्धि होती थी, खुशहाली रहती थी। लेकिन वर्तमान समय में आया सुप्रीम कोर्ट का फैसला पश्चिम फोबिया से ग्रसित लोगों को भले सही लगे लेकिन इससे हमारी संस्कृति पर बहुत नकरात्मक प्रभाव पड़ने वाला है। इससे प्रेम, वफा, विश्वास जैसी भावनात्मक चीज़ों का गला घोंट दिया जाएगा।

    एक मध्यम वर्ग लड़की जो बचपन से अपने राजकुमार का सपना देखती है उसको भी अपने पति पर कभी विश्वास नहीं हो पाएगा क्योंकि क्या पता वह किसी और के साथ संबध रखता हो। जब औरत पर पति का अधिकार नहीं है और वह आज़ाद है किसी भी पुरुष के साथ विवाह बाद संबध बनाने को तो हो सकता है जिससे वह संबध बनाए वह किसी का पति हो, इस प्रकार हर पत्नी से अपने पति पर जो अधिकार, प्यार, विश्वास होता है वह छीन जाएगा और जो पवित्र प्रेम का बंधन होता है, जो कहीं न कहीं मानव व्यवहार की प्राकृतिक ज़रुरत है वह धीरे धीर समाप्त हो जाएगा। सिर्फ रह जाएगा ।

    नतीजा हमेशा की तरह वही होगा कि औरत फिर से शोषित होगी। जिस प्रकार बाज़ारवाद के प्रकोप ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा उसी प्रकार अब उसके लिए अपने घर, अपना रिश्ता, सुकुन सब छीन जाएगा। आज़ादी ने हमेशा से उसे न कुछ दिया न दे पाएगी सिवाय अवसाद एवं परेशानी के। हैरानी इस बात पर होती है कि आज़ादी के समर्थकों को नैतिकता की चिंता क्यों नहीं होती?

     

    यह लेख सहीफा खान के क़लम से नुमाया किया गया है.

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