आनंद बक्शी ने अपने करियर में बंदूक की जगह थामी कलम

बॉलीवुड – 30 मार्च 2019

अपने सदाबहार गीतों से लोगों को दीवाना बनाने वाले बॉलीवुड के मशहूर गीतकार आनंद बख्शी ने लगभग चार दशकों तक सभी के दिलों पर राज किया। फिल्म गीतकार आनंद बक्शी का 72 वर्ष की उम्र में साल 2002 में निधन हो गया था। आज आनंद बख्शी साहब की डेथ एनिवर्सिरी है।

आनंद बख्शी के पिता रावलपिंडी में बैंक मैनेजर थे। किशोरावस्था में आनंद टेलीफोन ऑपरेटर बनकर सेना में शामिल हो गए लेकिन बम्बई और सिनेमा दुनिया में आने की ख्वाहिश ने उन्हें इससे बांधे रखा। बंटवारा हुआ तो बक्शी परिवार शरणार्थी बनकर हिन्दुस्तान आ गए। जब मायानगरी में कुछ ना हुआ तो आनंद बख्शी ने फिर से सेना ज्वाइन कर ली और कुछ समय तक वहीं काम करते रहे।

सूत्रों के मुताबिक तीन वर्ष सेना में नौकरी करने के बाद उन्होंने तय किया कि उनकी जिंदगी का मकसद बंदूक चलाना नहीं गीत लिखना है। अपने फिल्मी करियर में बख्शी ने 4000 से ज्यादा गीत लिखे। उन्हें पहली बार गीत लिखने का मौका 1957 में मिला लेकिन सफलता उनसे दामन चुराती रही। 1963 में अभिनेता और निर्देशक राज कपूर ने उन्हें अपनी फिल्म ‘मेंहदीं लगे मेरे हाथ’ के लिए गीत लिखने का अवसर दिया। उसके बाद सफलता ने कभी आनंद बक्शी का साथ नहीं छोड़ा।

वर्ष 1965 में  ‘जब जब फूल खिले’ प्रदर्शित हुयी तो उन्हे उनके गाने ‘परदेसियों से न अंखियां मिलाना’ ‘ये समां.. समां है ये प्यार का’ ,’ एक था गुल और  एक थी बुलबुल’ सुपरहिट रहे और गीतकार के रूप में उनकी पहचान बन गई। आनंद बख्शी वो नाम है जिसके बिना म्यूजिकल फिल्मों को शायद वो सफलता नहीं मिलती जिनको बनाने वाले गर्व करते हैं। इनका नाम उन गीतकारों में शुमार हैं, जिन्होंने साल दर साल एक से बढ़कर एक गीत फिल्म इंडस्ट्री को दिए हैं।

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