क्या भारत में कामुकता का दमन मुगलों के दौर में किया गया ?

भारत में वैलेंटाइन डे मनाने के मुद्दे को लेकर लगभग हर साल ही विवाद होता है. एक तरफ़ जो लोग सार्वजनिक स्थानों पर प्यार करने को ग़लत नहीं मानते वो अपनी प्रेमिका को गुलाब का फूल देते हैं और हाथों में हाथ डाल कर पार्कों या बज़ारों में घूमते नज़र आते हैं.

लेकिन वहीं दूसरी तरफ़ कथित कट्टरपंथी हिंदू दल हैं जो मानते हैं कि सार्वजनिक स्थान पर प्यार करना अनैतिक है. वो ‘गश्त’ लगाते हैं और ऐसे प्रेमी जोड़ों को अपमानित करते हैं और उन्हें परेशान करते हैं. ख़ुद को न्याय देने वाला मानने वाले ऐसे लोगों की उपस्थिति उन लोगों की सोच को एक तरह से आश्चर्यचकित कर देती है जो भारत को कामसूत्र को जन्म देने वाली और उत्तेजक मूर्तियां बनाने वाली भूमि मानते हैं.

धर्म पर शोध करने वाली जानी-मानी इतिहासकार मधु खन्ना बताती हैं , “भारत के बनने से संबंधित दर्शन के अनुसार ब्रह्मांड लौकिक इच्छा से बनाया गया था और कामुकता को पवित्र माना गया था.” वो कहती हैं, “अपनी इंद्रियों को सुख देना इसका हिस्सा है और ये इंसान के जीवन और उसके श्रेष्ठतम बनने के उद्देश्यों में से एक है. कामुकता शर्म महसूस करने जैसी बात नहीं है, लेकिन इसके विपरीत भारतीयों के लिए इसकी जगह बहुत महत्वपूर्ण है- सेक्स के तौर पर नहीं बल्कि जीवन जीने की ख़ूबसूरती के तौर पर.”

इस संदर्भ में देखें तो आप पाएंगे कि जिस प्रकार कामुकता को दिखाना भारतीय संस्कृति में संभव हो सका उतना पश्चिमी या किसी अन्य संस्कृतियों में नहीं हो सका.कामुकता के बारे में सबसे विस्तृत मानी जाने वाली किताब ‘कामसूत्र’ तीसरी सदी में लिखी गई थी और ये किताब प्राचीन भारत के बारे में बहुत कुछ कहती है. ‘कामसूत्र’ का अंग्रेज़ी में अनुवाद करने वाले आदित्य नारायण हक्सर कहते हैं, “संस्कृत में काम का अर्थ सेक्स नहीं है बल्कि आनंद लेना है, अपनी इच्छा को पूरा करने का सुख लेना है.”

यह किताब जीवन के प्रत्येक हिस्से में सुख की खोज करने के बारे में है. हक्सर सावधानी से इसे शब्दों में बांध कर कहते हैं, “ये खोज इंसानी जीवन के तीन मुख्य सिद्धांतों की खोज का एक हिस्सा भर है. इसके अलावा जीवन में परोपकार और सुख पाने के लिए धन-संपत्ति की खोज है.”विशेषज्ञों की तरह जानकार मानते हैं कि लोगों की ये धारणा है कि 300 साल तक भारत में मुसलमानों का शासन रहा जिस दौरान भारत में कामुकता का दमन किया गया, लेकिन ये सही नहीं है. इतिहासकार खन्ना बताते हैं, “मानते हैं कि मुग़ल शासक इतने आज़ाद ख़्याल नहीं थे, लेकिन उन्होंने भारत को श्रेष्ठ बनने दिया और कला के क्षेत्र में अपना योगदान दिया.”

उनका धर्म इस्लाम था, लेकिन उन्होंने हिंदुओं के दैनिक काम के तरीके में कोई दखलअंदाज़ी नहीं की. मध्यकालीन इतिहास के जानकार और ‘लव ऑफ़ सेम सेक्स इन इंडिया’ के सह लेखक सलीम किदवई कहते हैं, “भारत में इस्लामी संस्कृति ने भी खुल कर सांस ली. मुगल काल के दौरान जो फ़ारसी शेरो-शायरी लिखी गई उसमें ईश्वर के अलावा समलैंगिक इच्छाओं की भी बात की गई है.”सलीम कहते हैं, “भारत में सेक्स को टैबू समझने का बदलाव एक जटिल प्रक्रिया है जिसे आसानी से समझा और समझाया नहीं जा सकता.”

वो कहते हैं, “लेकिन काफ़ी मशक्कत के बाद हम कह सकते हैं कि 19वीं शताब्दी के मध्य में ये बदलना शुरू हुआ. इसमें ब्रितानी ईस्ट इंडिया कंपनी के ख़िलाफ़ 1857 में हुए सैन्य विद्रोह को भी एक अहम घटना के रूप में देखा जा सकता है.”

हालांकि कामुकता एक ऐसी चीज़ है जिसे छुपाया नहीं जा सकता. वो कहती हैं, “यह समाज और लोगों की प्रकृति है, भारत ने इसे हर पल व्यक्त किया जाता है, ये जीवन के जीवंत होने और रंग, स्वाद और खुश्बू से भरे होने जैसा है.”

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