जानें भारतीय खाने से जुड़े रोचक तथ्य

आज विश्व खाद्य दिवस है। हमारे देश जिस प्रकार खाने को लेकर उत्साह देखने को मिलता है वह विश्व के किसी देश में नहीं मिलता। खाने को लेकर तमाम प्रकार के शोध होते रहते हैं, प्रतिदिन हर व्यक्ति खाने के नए टेस्ट विकसित करने के चक्कर में रहता है। यहां खाना केवल खाना नहीं बल्कि एक संस्कृति है, आस्था है।  भगवान को सात दिन और आठ पहर के हिसाब से लगने वाला 56 भोग हो या रमज़ान में दी जाने वाली इफ्तार की दावतें, भोजन यहां राजनीति आस्था और क्रांति सबमें शामिल रहा है। विश्व खाद्य दिवस पर चलिए जानते हैं भारत और उसके खाने से जुड़े कुछ मिथकः-

भारतीय खाना असल में भारतीय नहीं है

हाल फिलहाल में ताजमहल को भारतीय संस्कृति से अलग करने की तमाम बातें हुई हैं। लेकिन यदि हम विदेशी आक्रमणकारियों के साथ आए भोजन को अपनी थाली से निकाल दें तो भारतीय भोजन पर गर्व करने वाली कई चीजें खत्म हो जाएंगी। आप जिस दाल चावल को भारतीय भोजन मान कर तृप्त होते हैं उसमें चावल के साथ दाल या कुछ भी रसे वाला मिलाकर खाने का मूल कॉन्सेप्ट भारत में बाहर से आया है।

 

हम कुपोषित भी हैं और मोटे भी

पिछले कुछ दिनों से ग्लोबल फूड इंडेक्स में भारत की स्थिति को लेकर विवाद चल रहा है। इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टिट्यूट की रिपोर्ट काफी पेचीदा है और इससे ये नतीजे निकालना कि भारत में कुपोषण पिछले तीन साल में बढ़ा है या नहीं बढ़ा है, दोनों ही गलत हैं। मगर इसमें कोई दो राय नहीं कि हम दुनिया के कुपोषित देशों में से हैं। इसके साथ ही हमारे यहां ज़रूरत से ज्यादा वजन वाले लोगों की गिनती भी खूब है।

दरअसल इतिहास के कई सौ सालों में देश में पड़ने वाले अकाल आदि के कारण भारतीयों का शरीर जेनेटिक रूप से ज्यादा फैट जमा करने के लिए प्रोग्राम है। बीयर बेली यानी पेट के पास चर्बी जमा होना देश के लोगों की बड़ी समस्या है। इसके साथ ही भारतीय खाने में प्रोटीन नहीं कार्बोहाइड्रेट (आलू, गेहूं और चावल) सबसे ज्यादा होता है। जिसके चलते हम में से ज्यादातर लोग शारीरिक रूप से संतुलित नहीं होते हैं। भारत में 10 करोड़ के करीब पुरुष और 20 करोड़ महिलाएं मोटापे से परेशान है। इसके साथ ही देश के 44% बच्चे कुपोषण का शिकार हैं।

 

मुगल खाने में मुगल कुछ भी नहीं है

भारत हर चीज का भारतीयकरण कर देता है। ठेले पर बिकती चाउमीन को देख कर चीन वालों को शायद अहसास ही न हो कि हिंदुस्तानियों ने उनकी चाउमीन के साथ क्या कर दिया है। इसी तरह से मुगलई खाने के नाम पर बिक रहे खाने में ज्यादातर मुगलों की विरासत नहीं है। बिरयानी को ही ले लीजिए ईरान की जिस बिरयान डिश से हिंदुस्तान की ये प्रिय रेसिपी आई है, उसमें चावल होता ही नहीं है। असल डिश में रोटी के अंदर मीट रखा होता है।

भारत में जो बिरयानी पॉपुलर है उसको मुगलों ने नहीं स्थानीय नवाबों और राजाओं ने बनाया। इसीलिए आपको आगरा की बिरयानी नहीं लखनऊ और हैदराबाद की बिरयानी सुनने को मिलेगी। चिकन और कबाब की ज्यादातर किस्में भी पंजाब दिल्ली और लखनऊ से ही निकल कर आई हैं। मगर इनको भारत ने ऐसे अपनाया है कि हम इनके विदेशी होने की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।

हम एक मांसाहारी देश हैं

सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम की 2014 की रिपोर्ट के हिसाब से से 15 साल की उम्र से ज्यादा के 71 फीसदी भारतीय मांसाहारी हैं। ऐसा भी नहीं है कि ये चलन हाल के सालों में बढ़ा हो। 2004 में ये आंकड़ा 75 प्रतिशत के करीब था। वैसे खास बात ये है कि भारत में नॉन-वेज खाने वाले ज्यादातर लोग रोज मांसाहार नहीं करते हैं। दक्षिण के राज्य 98 प्रतिशत तक मांसाहारी हैं जबकि राजस्थान 23 फीसदी के साथ सबसे ज्यादा शाकाहारियों वाले राज्यों में हैं।

 

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