क्या दर्शाना चाहता है अपने विज्ञापन में डव

ब्यूटी प्रॉडक्ट बनाने वाली कंपनी डव अपने हालिया एड की वजह से चर्चा में चल रही है। इस कंपनी के नए एड को रेसिस्ट कहा जा रहा है। कंपनी ने एड ही कुछ ऐसा बनाया है। 3 सेकेंड के इस वीडियो को अमेरिका में फेसबुक पर प्रमोट किया जा रहा था।

इस एड में एक अश्वेत महिला भूरे रंग की टीशर्ट निकालती है और अंदर से एक श्वेत महिला मुस्कराती हुई निकलती है. इसके बाद फिर टीशर्ट उठने के बाद एक तीसरी महिला निकलती है।

लोगों ने इस एड को रेसिस्ट कहना शुरू कर दिया। #BoycottDove ट्रेंड होने लगा और कंपनी ने माफी मांग ली। कंपनी का अपने बचाव में कहना था कि वो इस एड से संदेश देना चाहती थी कि हर कोई खूबसूरत है।

कंपनी ने कहा कि हम वास्तविक खूबसूरती में विश्वास करते हैं लेकिन इस बार हम इस एड से वो नहीं दिखा सके, जो हम दिखाना चाहते थे। ये उस सिद्धांत और विचारधारा के बिल्कुल उलट है, जिसपर हम चलते हैं।

कंपनी की ओर से आई माफी के बाद अब एड में दिख रही पहली अश्वेत महिला भी सामने आ गई हैं। लोला ऑगुनयेमी के नाम से द गार्डियन में एक लेख छपा है। इस लेख में लोला ने कहा है कि वो कोई विक्टिम नहीं है। लोला ने कहा है कि वो बहुत खुश थीं कि उन्हें डव के एड में काम करने का मौका मिल रहा है। वो इस मैसेज को लोगों तक पहुंचा सकती हैं कि हर रंग-रूप की महिला अपने आप में खूबसूरत है लेकिन इस एड से निकले मैसेज से वो हैरान हैं।

लोला ने लिखा है, ‘बचपन से ही मुझे कहा जाता था कि डार्क स्किन होने के बावजूद तुम सुंदर हो। मैं ऐसी सोसाइटी में पैदा हुई हूं, जहां लोग सोचते हैं कि डार्क स्किन वाली औरतें थोड़ी सुंदर दिखतीं अगर उनकी स्किन थोड़ी लाइट कलर की होती।’

लोला ने कहा है कि जब उन्हें ये मौका मिला, तो वो बहुत खुश हुईं। वो इस एड से इसलिए जुड़ी क्योंकि वो अपने नस्ल की महिलाओं की ओर से ये मैसेज देना चाहती थीं कि हम भी खूबसूरत हैं और हमें भी वैल्यू दी जाती हैं लेकिन फिर लोगों की तरफ से खुद को रेसिस्ट एड का पोस्टर चाइल्ड बना देने की वजह से बहुत अपसेट हूं।

इस लेख में आगे लोला ने बताया है कि शूट के वक्त हमें नहीं पता था कि आखिरी एडिटिंग के बाद एड कैसा दिखेगा, उन्हें ये भी नहीं पता था कि वो इसमें दिखाई भी देंगी या नहीं लेकिन हम सबको एड का उद्देश्य पता था और सबकुछ बहुत पॉजिटिव था।

हम लोला की बात समझ सकते हैं। अगर आप किसी विचारधारा का समर्थन करते हैं और इसे किसी माध्यम से लोगों के सामने पहुंचाना चाहते हैं लेकिन आउटकम बिल्कुल उलट आता है, तो आप हैरान रह जाते हैं लेकिन कुछ सवाल भी हैं, जो लोला या एड के शूट में हिस्सा लेने वाली सभी महिलाओं के सामने रखे जाने चाहिए? ये एड उन्हें रेसिस्ट क्यों नहीं लगा? क्या उन्हें नहीं पता था कि वो क्या कर रही हैं? उन्हें एड के आउटकम का अंदाजा तो रहा होगा?

माना कि इस एड में बाकी 7 कंटेस्टेंट और भी हैं, जिन्हें इस फेसबुक एड का हिस्सा नहीं बनाया गया है। लेकिन फिर भी इस एड से कंपनी कोई क्रांतिकारी मैसेज तो नहीं दे पा रही है।

कंपनी पहले भी इस मामले में फंस चुकी है।  2011 के एक एड में कंपनी ने बिफोर आफ्टर के फॉर्मेट में बिफोर में एक अश्वेत महिला और आफ्टर में एक श्वेत महिला को दिखाया गया था। ये तो रेसिज्म की हद है। फिर ये कैसे मान लें कि कंपनी ऐसी गलती कर ही नहीं सकती। नीविया ने भी अपने कैंपेन का नाम रखा था ‘वाइट इज प्योर’ क्यों? ये कंपनियां क्यों गोरे रंग पर इतनी मरी-मिटी क्यों हैं?

वैसे भी फेयरनेस क्रीम पर बहुत सी बहसें चली हैं और चल रही हैं। लेकिन कंपनियां हर बार इस मामले से बड़ी आसानी से निकल जाती हैं ये दावा करके कि वो रियल ब्यूटी को सपोर्ट करते हैं, या वो हर रंग खूबसूरत है, जैसी विचारधारा का समर्थन करती हैं। लेकिन हर बार वो वही गलतियां करती हैं और हर बार चिकनी चुपड़ी आदर्श से लिपटी माफी मांगकर निकल लेती हैं।

तो क्या हमें इनके खिलाफ कड़ा विरोध करने की जरूरत नहीं है?

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