ताज की अनदेखी क्यों कर रही है योगी सरकार

उत्तर प्रदेश में योगी सरकार को आए अभी छह महीने ही हुए हैं पर राज्य सरकार की दशा-दिशा ऐसी है कि इतने कम समय में ही उसने एक के बाद एक कई विवाद पैदा किए हैं। ताजा उदाहरण उत्तर प्रदेश के पर्यटन स्थलों की सूची से ताज महल को बाहर रखने का है। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के पर्यटन विभाग ने बत्तीस पृष्ठों की एक पुस्तिका जारी की है जिसमें पर्यटकों के लिए आकर्षक स्थलों की सूची दी हुई है।

इस सूची में मथुरा, वृंदावन के मंदिरों और काशी के घाटों समेत बहुत सारे धार्मिक व सांस्कृतिक स्थल तथा ऐतिहासिक धरोहर शामिल हैं। इसमें गोरखपुर के गोरख पीठ को भी जगह मिली है, जिसके महंत खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं। इस सूची में बस ताज महल नदारद है, जो उत्तर प्रदेश ही नहीं, पूरे देश में पर्यटकों के लिए आकर्षक स्थलों में शीर्ष पर रहा है।

सारी दुनिया से सैलानी ताज महल देखने आते रहे हैं। और क्यों न आएं, इसे विश्व के सात आश्चर्यों में से एक माना जाता है। उत्तर प्रदेश इस पर फख्र करता आया है कि ताज महल कहीं और नहीं, उसके पास है। इससे उसकी अर्थव्यवस्था को भी हमेशा सहारा मिला है। ऐसे में ताज महल को उत्तर प्रदेश के पर्यटन स्थलों की सूची से बाहर कर देना घोर हैरानी का विषय है। इसलिए विवाद उठना स्वाभाविक है।

विपक्ष की तमाम पार्टियों ने योगी सरकार के इस कदम को नितांत अनुचित और बेतुका करार दिया है। राज्य सरकार को जरूर अंदाजा रहा होगा कि इस तरह की प्रतिक्रियाएं हो सकती हैं। फिर, उसने ताज महल की अनदेखी क्यों की? शायद इसलिए कि वह उत्तर प्रदेश की एक ऐसी पहचान पेश करना चाहती होगी जिससे हिंदुत्व की उसकी राजनीति को बल मिले। लेकिन उसने यह कैसे मान लिया कि उसके इस कदम से सारे हिंदू खुश होंगे? ताज महल एक मुगल बादशाह ने अपनी बेगम की याद में मकबरे के तौर पर बनवाया था।

ऐसे ऐतिहासिक स्मारक को उत्तर प्रदेश की शान माना जाए, यह शायद योगी सरकार और भाजपा को गवारा नहीं होगा। अलबत्ता विवाद उठने पर राज्य सरकार ने एक बयान जारी कर सफाई दी है कि पर्यटन परियोजनाओं के लिए प्रस्तावित 370 करोड़ रुपए में से उसने 156 करोड़ रुपए ताज महल की देखरेख और उसके आसपास के इलाकों के विकास के लिए रखे हैं। लेकिन सवाल है कि फिर ताज महल के साथ ऐसा सलूक क्यों?

ऐतिहासिक धरोहरों और पर्यटक स्थलों को दुनिया में कहीं भी सांप्रदायिक या संकीण राष्ट्रवादी नजरिये से नहीं देखा जाता। इन्हें सारी मानव सभ्यता की उपलब्धि के रूप में देखा जाता है और ऐसे ही देखा जाना चाहिए। क्या हम चीन की दीवार या गीजा के पिरामिड या पीसा की मीनार से घृणा कर सकते हैं? ताज महल कहीं बाहर से नहीं लाया गया था, भारत में ही यहीं के पत्थरों से बना और भारत के ही स्थापत्य, कारीगरी और कला का बेमिसाल नमूना है।

इसके निर्माण में जाने कितने हिंदू कारीगरों का भी योगदान रहा होगा। यह बेहद अफसोस की बात है कि ताज महल के मान मर्दन का प्रयास हो रहा है और वह भी मुट्ठी भर सिरफिरे लोगों द्वारा नहीं, बल्कि खुद उत्तर प्रदेश सरकार के द्वारा। क्या यह एक ऐसी दिशा में जाने की कोशिश है जिसमें इतिहास और संस्कृति से लेकर समूची मानवता की विरासत तक, सब कुछ का विवेक खो जाता है?

 

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