सेक्सिज़म से कब आज़ाद होंगी महिलाएं?

सऊदी अरब से दुनिया भर की औरतों के लिए एक अच्छी खबर आई है। इस खाड़ी देश में पहली बार महिलाओं को ड्राइविंग करने की इजाजत मिल गई है। पूरी दुनिया में सउदी अरब ही अकेला एक देश था, जहां औरतें ड्राइव नहीं कर सकती थीं, अगर वो ऐसा करती तो, उन्हें या तो जेल की सजा हो जाती या जुर्माना भरना पड़ता है। लेकिन अब वो बिना किसी प्रॉब्लम के गाड़ी चला सकेंगी।

लेकिन अब उन्हें एक दूसरी समस्या का सामना करना पड़ेगा वो है सेक्सिज्म। रोड पर चलते हुए उन्हें अब सुनना होगा कि उन्हें गाड़ी चलाना नहीं आता और वो रैश ड्राइविंग कर रही हैं। आप चाहें तो बात बिल्कुल सेक्सिजम और फेमिनिज्म पर ले जाकर नाक-भौं सिकोड़ लें लेकिन आगे कुछ जरूरी बातें हैं, जिन पर एक बार नजर जरूर डाल लें।

दरअसल, यहां खेल विचार का है। सदियों से औरतों को घर की चारदीवारियों से बाहर के विषयों में दोयम दर्जे का समझा जाता है। उनका अधिकारक्षेत्र बस घर है, इसके बाहर के विषयों में उनकी कोई पकड़ नहीं, ऐसा ही माना जाता है। घर में कोई सामान बिगड़ गया तो उसे ठीक करने की जिम्मेदारी घर की मर्द जनसंख्या की होती है क्योंकि ये क्षेत्र भी कभी औरतों का नहीं रहा, वो खाने में नमक और किचन के बजट का हिसाब रखने के लिए होती हैं और बात जब गाड़ी चलाने की हो, तो ये काम तो पहले से ही मर्दों का रहा है। यहां तक कि हमने आदिवासियों के विकास को पढ़ते हुए मर्दों को ही लकड़ी का पहिया पकड़े हुए देखा है, फिर औरतें इस क्षेत्र में कहां मास्टरी कर पाएंगी?

औरतों को पूरी दुनिया में बुरा ड्राइवर माना जाता है। लेकिन यहां बात भारत की, सउदी के बहाने, औरतें जब रोड पर गाड़ी लेकर निकलती हैं तो उन्हें एक्सीडेंट, सधी हुई ड्राइविंग, ट्रैफिक रूल्स का ध्यान रखने के अलावा भी एक बात का डर होता है। कहीं कोई कमेंट करता हुआ न चला जाए, कहीं कोई बुरे तरीके से ड्राइव करने की तोहमत न लगा जाए। कहीं कोई आंखे तरेरते हुए ताने न मार जाए।

भारत में औरतों को लेकर ये सामान्य धारणा है। अगर आप चार लोगों के सामने ये टॉपिक उठाएं, तो उनमें से तीन जरूर कोई किस्सा लेकर बैठ जाएंगे। सबको यही कहना होगा कि औरतें भयंकर ड्राइवर होती हैं। ‘भाई, लड़कियों की ड्राइविंग तो बस उन्हें ही समझ आती है’, ‘यार क्या गाड़ी चलाती हैं लड़कियां…कुछ भी’, ‘हां भाई, ऊपर से आंखें भी उल्टा सामने वाले को ही दिखाती हैं’….. और भी न जाने क्या-क्या।

क्यों? क्या सच में औरतें इतनी बुरी ड्राइवर होती हैं? उनकी स्टीरियोटाइप इमेज ऐसी क्यों बना दी गई है? देखा जाए, तो औरतें आदमियों की तुलना में ज्यादा सजग ड्राइवर होती हैं। उनमें चारों ओर देखकर गाड़ी चलाना, ट्रैफिक सिग्नल पर नजर रखने की प्रवृत्ति ज्यादा होती है। आदमियों की तुलना में औरतों के साथ स्मोकिंग और ड्रिंक करके गाड़ी चलाने जैसी बात भी ज्यादातर देखने में नहीं आती है।

औरतों का एक और स्वाभाविक गुण होता है, जो उन्हें एक बेहतर ड्राइवर बनने में मदद करता है- वो कंट्रोल फ्रीक होती हैं। उन्हें अपने सामने हो रही चीजों पर कंट्रोल रखने की आदत होती है, जो उनके कॉन्सन्ट्रेशन और परफेक्शन को तराशता है। जबकि, आदमियों में जरूरी नहीं कि ये गुण हो, वो कुछ-कुछ चीजों को लेकर लापरवाह होते हैं। और ये बात सामान्य महिला-पुरुष के मनोविज्ञान को लेकर कही जा रही है।

लेकिन भारत में तो औरतें दशकों से ड्राइविंग कर रही हैं हां, उनकी संख्या मर्दों की तुलना में जरूर कम है या वो उतना नियमित रूप से ड्राइविंग नहीं करतीं लेकिन इस क्षेत्र में उन्होंने दशकों पहले दखल दे दिया था। इस तथ्य के आंकड़ें तो नहीं हैं कि पूरे भारत में कितनी महिला ड्राइवर हैं लेकिन कुछ आंकड़ें हैं, जो ये जाहिर करते हैं कि औरतों की तुलना में मर्द कई गुना ज्यादा रैश ड्राइविंग करते हैं, और उन्हीं से ज्यादा एक्सीडेंट होते हैं।

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट में 2014 के कुछ आंकडे़ें हैं, जो मर्द और औरत ड्राइवरों में जबरदस्त फर्क दिखाते हैं। इन आंकड़ों के मुताबिक, 2014 में रैश ड्राइविंग और रोड रेज के चलते अरेस्ट हुई औरतों की संख्या 1,355 थी, वहीं 3,92,649 आदमियों को गिरफ्तार किया गया। इसके अलावा रोड एक्सीडेंट में हुई मौतों के चलते पूरे भारत में 301 महिलाएं गिरफ्तार की गईं, वहीं 1,13,817 मर्दों की गिरफ्तारी हुई।

औरतों ने पिछले साल यानी 2016 में फाइटर प्लेन तक पहुंच बनाई है। लेकिन वो अभी भी इस बात को लेकर जवाब देती फिर रही हैं कि वो भी एक सजग ड्राइवर हैं और रोड उनकी भी है। उन्होंने अभी तक अपनी शिक्षा, अपनी बॉडी, अपने अधिकारों को लेकर लड़ाई लड़ी है, रोड की लड़ाई भी उन्हें ही लड़नी है।

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