झुग्गी-झोपड़ी के एक बच्चे के संघर्ष ने, इस लेखक को दिलाया बॉलीवुड में मुक़ाम

Hallabol Desk –मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर’ सुनने में अपील सा लगने वाला ये शीर्षक कोई मामूली शीर्षक नहीं बल्कि जाने माने फिल्म डायरेक्टर राकेश ओम प्रकाश मेहरा की आने वाली फिल्म का नाम है जिसको मनोज मैरता ने लिखा है।

दिल्ली में अपनी स्टूडेंट लाइफ़ के दौरान मनोज ने ज़िन्दगी एक ऐसे सच को देखा जिसने उनके मुस्तक़बिल को बदल कर रख दिया मनोज बतातें हैं की जब वह दिल्ली में पढ़ते थे तब उन्होंने झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले एक बच्चे को देखा जो अपनी माँ के खातिर टॉयलेट बनाने के लिए कितना संघर्ष करता है और छोटी सी उम्र में उस बच्चे का संघर्ष उसको किस तरहा मज़बूत बनाता है। ये बात मनोज के दिल और दिमाग में ऐसी बैठी जिसको मनोज निकाल न सके और मुंबई पहुँच कर उन्होंने अपने क़लम की रोशनाई से दिल में बैठी उस बात को कागज़ पर ऐसे उतारा मानों कि सब कुछ सामने ही हो रहा हो और उसे एक फिल्म की स्क्रिप्ट का रूप दे दिया जिस पर जाने माने डायरेक्टर राकेश ओम प्रकाश मेहरा ने फिल्म बना दी।

रंग दे बसंती और भाग मिल्खा भाग जैसी फिल्में बना चुके डायरेक्टर राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने जैसे ही यह कहानी सुनी उनके दिल को छू गई और अब मनोज मैरता की स्क्रिप्ट पर बन रही इस फिल्म की शूटिंग पूरी हो चुकी है। इस फिल्म में मां का किरदार अंजलि पाटिल निभा रही हैं जो कि नेशनल अवॉर्ड जीत चुकीं अदाकारा हैं। फिल्म के बाल कलाकार झुग्गियों के ही बच्चे हैं।

विकास का एक कड़वा सच 

मनोज का कहना है कि एक तरफ भारत विकास की उंची उंची छलागों को लगाने के लिए कमर कसता दिख रहा है मगर वहीं दूसरी तरफ आधी से ज्यादा देश की आबादी तो खुले में शौच को मजबूर है, ऐंसे में विषय के तौर पर तो ये एक सामान्य विषय ही है, मगर मनोज मैरता ने इस विषय को जिस तरह मां-बेटे के रिश्ते के बीच पिरोया है वो बड़ा ही असरकारक है। यही असर उनको तब देखने को मिला जब राकेश मेहरा जैसे अनुभवी डायरेक्टर को उन्होंने अपनी स्क्रिप्ट दी तो पहली ही बार में उन्होंने इस स्क्रिप्ट को फिल्मी परदे पर उतारने की बात कह डाली। उनका कहना है कि फिल्मी दुनिया में आइडिया की बात तो हर कोई कर लेता है मुंबई के अंधेरी वेस्ट इलाके के करीब सभी सभी कॉफी शॉप में फिल्मों से जुड़े लोग बहुतेरे आइडियाज़ लाते रहते हैं मगर असली बात है उस आइडिया के स्क्रिप्ट बनने तक की यात्रा, जिसे मनोज मैरता ने इस शिद्दत से पूरा किया।

 

मनोज और बॉलीवुड

बतौर राइटर मनोज की ये पहली फिल्म है तो ऐंसे में उनकी लिखी स्क्रिप्ट और शूट हुई फिल्म में कितना अंतर है और उन्हें इस दौरान क्या कुछ सीखने को मिला। इस सवाल पर मनोज ने बताया कि वो अपनी स्क्रिप्ट पर करीब चार साल से काम कर रहे थे, और उनको तब बहुत खुशी मिली जब उनकी ये स्क्रिप्ट लोकेशन और कुछ किरदारों को मिलाकर एक कर देने भर के बदलाव के साथ कमोबेश वैसी की वैसी बनी जैसी उन्होंने लिखी थी।

मनोज का कहना रहा कि राकेश जी दिल्ली बेस्ड कई फिल्में पहले बना चुके हैं तो वो एक बदलाव चाहते थे लोकेशन का, जिसे दिल्ली से मुंबई कर दिया गया। और ये बदलाव आसान रहा क्योंकि कहानी तो वही झुग्गी वालों की ही है, मुद्दा भी वही है और आसपास की दुनिया भी वही। वो आगे बताते हैं कि भारत में झुग्गी वालों की बस अपनी बस्ती की पहचान होती है फिर चाहे वो दिल्ली हो या मुंबई, उनका शहर तो बस वह झुग्गी बस्ती भर ही होता है।

 

आज तो टॉयलेट का मुद्दा प्रधानमंत्री के लाल किले की प्राचीर से दिए जाने वाले पंद्रह अगस्त के भाषण में भी उठता है ऐसे में एक लेखक के तौर पर मनोज को कैसा लगता है जब उनके भीतर चल रहा विषय एक आंदोलन की रूप ले लेता है।

 

स्वच्छ भारत अभियान में  जागरूकता 

इस पर मनोज बताते हैं कि ये विषय तो आम है वो मोदी सरकार बनने से पहले ही इस विषय पर फिल्म लिख चुके थे, लेकिन हां देश भर में फैल रही जागरूकता ने एक तरह से उनकी लिखी फिल्म को परदे पर लाने में आसान बना दिया क्योंकि अब शहर के लोग जिन्होंने इस समस्या को कभी देखा ही नहीं वो भी जानने समझने लगे कि किस तरह सिर्फ अपना घर भर ही साफ रहने से गंदगी दूर नहीं होने वाली, गलियों में और शहरों में फैल रही गंदगी के लिए कहीं न कहीं हम सभी समान रूप से जिम्मेदार हैं और हमारे चारों और सफाई बनाए रखना हमारा कर्तव्य है, इसके लिए खुद को ही कोशिशें करनी होंगी, क्योंकि ये किसी एक व्यक्ति का मिशन नहीं बल्कि जन आंदोलन है जिसमें सभी का शरीक होना ज़रूरी है, तभी देश स्वच्छ होगा।

भविष्य मेंं वह शिक्षा के ऊपर एक वुमन ओरियेंटेड कहानी जिसे उन्होंने लिखा है उसे खुद ही डायरेक्ट करना चाहते हैं। इसके अलावा गांधी जी के विचारों पर बच्चों की भी एक कहानी लिखी है, एक गुजरे जमाने के स्टार की कहानी पर वह अमिताभ बच्चन को लेकर काम करना चाहते हैं। एड्स के ऊपर भी एक अच्छी स्क्रिप्ट लिख चुके हैं।

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